शिक्षा की रूग्णावस्था


सरकारी तथा गैर-सरकारी सर्वेक्षण हिमाचल प्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता पर निरंतर रिपोर्ट पेश करते रहे हैं। इनमें शिक्षा के स्तर में आ रही अभूतपूर्व गिरावट गंभीर चिंता का विषय है। हैरतअंग्रेज ढंग से अस्सी प्रतिशत विद्यार्थी वांछित मानकों को पूरा करने में असफल हैं। स्नातक हो या स्कूल का विद्यार्थी, इंजीनियरिंग हो या विज्ञान के विषय हों, सभी क्षेत्रों से निराशाजनक परिणाम आ रहे हैं। यह एक या दो वर्ष का विषय नहीं है बल्कि स्थिति में सुधार के स्थान पर अराजक अव्यवस्था की ओर संकेत कर रहे हैं। प्रदेश के आंकड़े लगभग शत-प्रतिशत स्कूल प्रवेश दर तथा राष्ट्रीय औसत से बेहतर उच्च शिक्षा प्रवेश दर दिखा रहे हैं। शिक्षा हब के रूप में राज्य का प्रचार किया जा रहा है। यह एकांगी प्रवेश तो सही है लेकिन निकासी प्रतिभा का शून्य होना सारी व्यवस्था को अप्रासंगिक सिद्ध कर रहा है। इतना बड़ा शिक्षा विभाग और भारी भरकम कर्मचारी तथा ढांचागत सुविधाओं पर निरंतर बढ़ता वजट व्यय, यदि अकुशल, अयोग्य तथा बेरोजगार युवा समाज को भंग करने का उपक्रम है तो एक गंभीर प्रश्न चिन्ह लगता है कि ये मानव संसाधन कहां प्रयुक्त होंगे कृषि में, व्यापार में सरकारी क्षेत्र में या गैर-सरकारी क्षेत्र में इनका दुरूपयोग होगा। युवा भारत की यह मेघा जिसके दोहन की कोई स्पष्ट नीति नहीं है न योजना है केवल सांख्यिकी के आंकड़े ही बने रहेंगे या विध्वंस के स्त्रोत तो नहीं बन जाएंगे। कौशल विकास भत्ते और असंगठित क्षेत्र में अनेक विद्या शोषण के लिए बाजार में उतारे जाएंगे। जब उपयोग ही नहीं है तो मानव प्रयोग किसलिए। स्थिति को भयावह बनाने के लिए हर महीने नए स्कूल तथा कॉलेज खोलने की घोषणा की जा रही है। न भवन, न स्टाफ न सुविधाएं न भविष्य की कोई ठोस कार्ययोजना बनाई जा रही है। इन्जीनियरिंग, बी. एड. के कॉलेज बन्द हो रहे हैं, इसी तर्ज पर दो दशक पूर्व खोले गए प्राथमिक विद्यालय बंद किए जा रहे हैं। अन्धाधुन्ध और अव्यावहारिक संस्थान खोलने और बन्द करने का एक दुश्चक्र चल रहा है। सरकारी क्षेत्र में सुचारू और व्यवस्थित ढंग से चल रहे संस्थानों से कहीं स्टाफ तो कहीं विद्यार्थी वेतरतीव इधर-उधर किये जा रहे हैं इसके कारण चले चलाए संस्थानों की गुणवत्ता प्रभावित हुई है तो दूसरी ओर शिक्षण और प्रशिक्षण संस्थानों के स्तर के साथ समझौता हो रहा है। मेडिकल कॉलेज हो या इंन्जीनियरिंग कॉलेज, डिग्री कॉलेज हों या स्कूल, सभी जगहों का यही आलम है। इससे बड़ी बात यह है कि युक्तिकरण और समायोजन से नये शिक्षण संस्थानों को चलाने की घोषणा की जा रही है। लगभग 80 प्रतिशत छात्र प्राईवेट स्कूलों से शिक्षा ग्रहण कर रहे है तथा सरकारी स्कूलों की दशा में सुधार अच्छे परिणाम दे पाया है न ही सरकारी स्कूलों से मिलने वाली षिक्षा के स्तर में विश्वास जगा पाया है। परिणामत: स्कूलों में बच्चों की संख्या कम हुई तथा प्राईवेट स्कूलों ने अपनी मार्किटिंग से उन्हें लुभाया तथा प्रवेश में वृद्धि की। स्पष्ट है कि बड़े पैमाने पर सरकारी नौकर सरप्लस हुए या तो उन पदों को आर्थिक सुधार की आड़ में समाप्त कर दिया गया अथवा समायोजित कर दिया गया । तीसरे विकल्प के रूप में एक सरकारी कर्मचारी के वेतन पर पीटीए/एसएमसी जैसे अस्थाई प्रबन्धों से एक के वेतन पर पांच कर्मचारी रखने के योजना को कार्यरूप दिया गया। एक ही शिक्षण संस्थान में एक विषय को पढ़ाने के लिए अनेक श्रेणियां हो गई हैं। एक अध्यापक पच्चास हजार मासिक पर है तो दूसरा पांच हजार पर, तीसरा पन्द्रह हजार की श्रेणी का है तो चौथा पदोन्नत वर्ग का होगा, कोई प्रत्यक्ष चयन से है तो कोई अप्रत्यक्ष मापदंड से आ रहा है। प्रशिक्षण के तौर तरीके व प्रक्रिया के स्तर भी भिन्न-भिन्न है। ऐसे अद्भुत् घालमेल से मानव और समाज मूल्यों पर आधारित चरित्र निर्माण और व्यक्ति निर्माण के द्वारा राष्ट्र निर्माण हास्यस्पद ही नहीं ढकोंसला है। रूसा के कारण कॉलेजों के श्क्षिा आपातकाल की अभी अन्त नहीं हुआ है कि एक और शिक्षानीति सम्भवत: अगले सत्र से आने वाली है। अंग्रेजों के शासन सहित पिछली स्वातन्त्रय सदी में इतने प्रयोग और अनिश्चितता नहीं रही, इतने बिना सिर पैर के प्रयोग नहीं हुए होंगे जितने पिछले दस सालों में हुए हैं तथा हो रहे हैं। यह कटु सत्य एक राज्य का भी है तथा कमोवेश सभी राज्यों का भी है। ऐसा अन्देशा हो रहा है कि सार्थक और रोजगारोन्मुख शिक्षा को जनसाधारण की परिधि से बाहर कर दिया गया है ताकि कुछ धनाढय और आभिजात्य परिवारों के विद्यार्थी लाखों रूपये व्यय करते हुए उत्कृष्ट संस्थानों में विशिश्ट शिक्षा पद्धति से शिक्षित हों तथा प्रभावी पदों पर आसीन होकर शासन करें तथा शेष अभिशप्त करोड़ों निरीह जनता के बच्चे मात्र साक्षर हों, शासित हों तथा कुशल कारीगर और मजदूर बन सकें । ऐसा इसलिए है क्येांकि वैश्वीकरण में शिक्षा निर्माण कार्य नहीं उद्योग है जिसमें आपार आर्थिक सम्भावनाएं हैं फिर इसके खिलाड़ी चाहे देसी करोड़पति हो या विदेशी अरबपति, क्या फर्क पड़ता है एक के लिए शिक्षा शासक वर्ग की तैयारी है तो दूसरे के लिए शासित प्रणाली अनुयायी की भूमिका का निर्माण है। जहां तक इस प्रदेश की नियति का प्रश्न है जहां सरकार को नए शिक्षण संस्थान खोलने बन्द करने चाहिए केवल विद्यमान संस्थाओं में स्टाफ, भवन और अन्य सुविधाओं को सुदृढ़ करना चाहिए । समाज को ऐसे संस्थानों को स्वीकार नहीं करना चाहिए जहां दस वर्ष तक किसी सुविधा की संभावना नहीं हो । पहले भवन आदि की सुविधाएं उपलब्ध हों अनन्तर शिक्षण संस्थान की घोषणा हो। इतने शिक्षण संस्थान पिछले 50 वर्षों में नहीं खोले गए होंगे जितने 15 वर्षों में घोषणा हुई है। ऐसी अति अनिवार्यता क्यों हैं? रेगुलेटरी कमीशन जैसी संस्थाओं और शिक्षा के अधिकार के क्रियान्वयन के पश्चात तो व्यावहारिक अराजकता शिक्षा जगत में पसर गई है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिन्दू शिक्षकों की नियुक्ति के लिए अलग संस्था का गठन होना चाहिए। पढ़े-लिखे लाखों नौ जवानों को एकरूप वेतन दिऐ जाएं तथा मैरिट का ध्यान रखा जाए । अध्यापक प्रशिक्षण, अध्यापक की ओर पाठ्यक्र की गुणवत्ता तथा शिक्षा प्रशासन जिसमें राजनीतिक हस्तक्षेप न हो इस बीमारी की आरिम्भक दवाई हो सकती है नही ंतो वह वातावरण बन चुका है जब यह प्रदेश और युवा बहुल नहीं बल्कि ऊबा-बहुल अवसादी देश होगा । दीर्घावधि के उपाय तो समय और अलग कार्ययोजना की अपेक्षा रखते हैं तुरन्त षल्य चिकित्सा तो कक्षा नौवी और दसवीं तथा डिग्री कॉलेजों में सेमेस्टर पद्धति को तुरन्त समाप्त करते हुए करनी चाहिए जैसा कि भयानक गुणवत्ता की गिरावट का एक कारण स्वीकार करते हुए अनेक राज्यों ने यह पहल शुरू कर दी है। सत्र परीक्षाओं ने खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा वार्षिक समारोह जैसे महत्वपूर्ण शिक्षागों को पंगु बना दिया है तथा पाठ्यक्रम भी सतही तौर पर दो महीने पढ़ाए जाते हैं । इसे वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर भी अपनाया जा सकता है जैसे इस सत्र में बी. एड. को सत्र या वार्षिक परीक्षा में विकल्प के तौर पर रखा गया है। ऐसे किसी भी कदम का समाज स्वागत करेगा तो व्यावहारिक हो तथा उच्च शिक्षा के मानकों से राष्ट्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति करने में सहायक हो । यह भी नहीं भूलना चाहिए कि शिक्षा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियत के अन्तर्गत आने वाला विषय है। जो निश्चित तौर पर उच्च गुणवत्तायुक्त व बिना किसी वर्ग भेद से सुनिचित करने के लिए बाध्य करता है। कम नियुक्तियां हों लेकिन सम्मानजनक ढंग से हों तथा बच्चों के भविष्य की संवेदनाओं को ध्यान में रखकर हों। प्राईवेट संस्थाओं की गुणवत्ता और वेतन नियमन इसी महामारी का दूसरा पक्ष है। जिसके लिए नीयत और नीति साफ होनी चाहिए, सरकार की भी तथा प्राईवेट ऑप्रेटरज की भी, नहीं तो गुणवत्ता के बिना यह अधूरी साक्षरता हमारी सामाजिक संरचना को विकट चुनौतियां प्रस्तुत करते हुए इसे रसातल तक ले जाएगी इसमें तनिक भी संशय नहीं रहना चाहिए।

shyam