भारत में निचले बाल लिंगानुपात (0-6 वर्ष आयु वर्ग में प्रति 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या) के कारणों पर गैर सरकारी संगठन सेव दि चिल्ड्रनकी एक हालिया रिपोर्ट ने महत्वपूर्ण निष्कर्ष दिए हैं। वर्ल्ड आफ इन्डियन गर्ल्स-2014’ शीर्षक से जारी रिपोर्ट की विशेष बात यही रही है कि इसने लड़कियों के लिंगानुपात से संबंधित नवीनतम आंकड़े और तथ्यों का इस्तेमाल कर इस पर अलग से रोशनी डाली है। रिपोर्ट ने लांसेट के अध्ययन के हवाले से बताया है कि परिवार में पहली संतान लड़का है तो दूसरी संतान के मामले में लिंगानुपात में कोई गिरावट नहीं होती, लेकिन पहली संतान के लड़की होने पर दूसरी संतान के मामले में लिंगानुपात गिर जाता है।


निश्चित तौर पर इसके लिए गर्भपात के गैर कानूनी तरीकों का सहारा लिया जाता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के तीसरे चरण के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं। इसके अनुसार परिवार की अंतिम संतान के मामले में लिंगानुपात बाकी संतानों की तुलना में 26 फीसदी कम होता है। यानी परिवार की अंतिम संतान के लड़की होने की दशा में उसे गर्भ में मार दिए जाने की संभावना सबसे अधिक होती है। वहीं रिपोर्ट से फिर कुछ पूर्व मान्यताएं और पूर्वाग्रह धराशायी हुए हैं। जाहिर हुआ है कि प्रायः शिक्षित और संपन्न तबकों में पुरुष संतान प्राप्ति की चाह अधिक होती है। इसके उलट सामाजिक-आर्थिक तौर पर पिछड़े माने जाने वाली मुस्लिम आबादी में लड़कियों का लिंगानुपात बेहतर पाया गया है।
ये निष्कर्ष उन धारणाओं के विपरीत हैं, जिसमें लिंग की जांच के मामलों का दोषी निचले और अशिक्षित तबकों को मान लिया जाता है। वास्तव में इन सभी निष्कर्षों से स्पष्ट होता है कि भारत में लड़कियों के लिए अस्तित्व की जद्दोजहद बचपन से ही आरम्भ हो जाती है। जन्म के बाद होने वाले भेदभावों का सिलसिला भी कम लम्बा नहीं होता। सर्वेक्षण में इस बात को रेखांकित किया गया है कि कुदरती और जैविक तौर पर मजबूत होने के चलते जन्म लेने के 1-28 दिन के भीतर बालिका के जीवित रहने की संभावना अधिक होती है। इस अवधि के बाद लालन-पालन और देखभाल के स्तर पर लड़कियों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
सांस संबंधी रोगों का इलाज लड़कों को लड़कियों के मुकाबले छह फीसदी अधिक उपलब्ध होता है। डायरिया जैसे जानलेवा रोग में लड़कियों के मुकाबले छह फीसदी ज्यादा लड़कों को मेडिकल सुविधाएं मुहैया करवाई जाती हैं। ये कुछ ऐसे रोग हैं, बाल्यावस्था में जिनका शिकार अधिकांश शिशु हो जाते हैं। सवाल है कि इस स्थिति से कैसे निपटा जाए? निश्चित तौर पर समाज में गहरे तक कायम पुरुषवादी सोच इसके पीछे मूल कारण है, लेकिन लिंग की जांच जैसे गैर-कानूनी कार्यों पर रोक और उसके लिए बने कानून का सख्त अमल तो सुनिश्चित किया जा सकता है। अफसोस है कि यह कार्य अपेक्षाकृत शहरी और पढ़े-लिखे तबकों में ज्यादा धड़ल्ले से जारी है।